Wednesday, 6 March 2013

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

Acharya Hazari Prasad Dwivedi

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी (19 अगस्त, 1907 - 19 मई, 1979) एक हिन्दी उपन्यासकार, साहित्यिक इतिहासकार, निबंधकार, आलोचक और विद्वान थे. उन्होंने कई उपन्यास, निबंध, मध्यकालीन भारत के धार्मिक आंदोलनों विशेष रूप से कबीर और नाथ सम्प्रदाय के बारे में, और हिन्दी साहित्य के ऐतिहासिक रूपरेखा पर ऐतिहासिक अनुसंधानात्मक कई संग्रह लिखे. हिंदी के अलावा, वे संस्कृत, बंगाली, पंजाबी, गुजराती, पाली, प्राकृत, और अपभ्रंश सहित कई भाषाओं के जानकार थे. मध्ययुगीन संत कबीर के विचारों, कार्य और साखियों पर उनका शोध एक उत्कृष्ट कार्य माना जाता है. उनके ऐतिहासिक उपन्यास बाणभट्ट की आत्मकथा (1946), अनामदास का पोथा, पुनर्नवा, चारु चन्द्र लेखा को क्लासिक्स माना जाता है. उनके यादगार निबंध नाखून क्यों बढते हैं (Why do the nails grow), अशोक के फूल, कुटज, और आलोक पर्व (संग्रह) आदि हैं.

एक ओर पारंपरिक भाषाओँ संस्कृत, पाली और प्राकृत, और दूसरी तरफ आधुनिक भारतीय भाषाओं के जानकार, डॉ. द्विवेदी ने अतीत और वर्तमान के बीच एक सेतु की तरह काम किया. संस्कृत के शास्त्रों के गहन ज्ञाता डॉ. द्विवेदी ने साहित्य - शास्त्र के साथ ही साथ भारतीय साहित्य के शाब्दिक परंपरा का विशद विवेचन किया है. वे इसके एक महान कमेंटेटर के रूप में जाने जाते हैं.

हिंदी साहित्य में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्म भूषण (1957) और 'आलोक पर्व' निबंध संग्रह के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार (1973) से सम्मानित किया गया.